Friday, May 15, 2020

मैं शर्मिंदा हूँ

मैं शर्मिंदा हूँ
अपने कुछ न कर पाने पर
सब देखते हुए चुप रह जाने पर

अपने सरों पर अपना घर उठाये ये लोग
दिनों- महीनों से पैदल चलते ये लोग
शहरों से बाहर निकलती हर सड़क पर,
भूखे प्यासे अपने गांव को जाते ये लोग
लाखों में है, पर नज़र नहीं आते ये लोग।

अख़बार की किसी तस्वीर में एक,
पैदल चलती बच्ची का एक क्लोज - अप
और उस क्लोज - अप से झांकती वो आँखें
मैं नहीं देखना चाहता उन आंखों में
वो फिर भी मुझे रह - रह कर ताकती हैं
मुझे मालूम है उन आंखों,
एक नहीं कई सारे सवाल हैं
मैं बस उन सवालों से उलझना नही चाहता
क्योंकि मेरे पास शर्मिंदगी तो है जवाब नही।

जब इतिहास लिखा जाएगा
तब इन लाखों लोगों का जिक्र भी आएगा
और इन पर हुए ज़ुल्मों को भी लिखा जायेगा
ज़ुल्म के सब भागीदारों को
कटघरे में खड़ा किया जाएगा

मैं भी वहाँ मिलूंगा, एक कटघरे में
शर्मिंदा, सर झुकाये।




Friday, April 17, 2020

इक्कीसवीं सदी का भारत

मैं बड़ा हुआ हूँ ये बात सुनते सुनते
कि इक्कीसवीं सदी भारत की होगी
पहले स्कूल, फिर कॉलेज और उसके बाद
जाने ही कितनी बार ये बात सुनी थी।

यही बात अनेक बुद्धिजीवियों ने,
विचारकों ने भी कई बार कही थी
यूँ तो ये बात नेताओं ने भी कही थी
कई बार, और जाने कितने मंचों से
बस जब वो ये बात कहते
तभी भरोसा डगमगाता था।

पर अन्यथा नेताओं के,
जब भी ये बात कही जाती
तब यही कहा जाता, आने वाली सदी
भारत की है, भारत के युवाओं की है
पंख लगा कर विज्ञान और तर्क के
अपने कर्म और विवेक से,
ले जाएंगे देश को आगे
यही बात कई बार कलाम ने भी कही थी
इसलिए भरोसा और विश्वास था।

आज पार कर लियें हैं इस सदी के बीस साल
तो पूछता हूँ अपने से, और सब से ये सवाल
क्या हम पहुँच पाये, निकले थे जहां के लिए
या भटक गए राह बीच में ही?

हमें तो बनाने थे स्कूल, विश्विद्यालय
और रिसर्च संस्थान अनेक
हमें तो गांव कस्बों तक हस्पताल पहुंचाने थे
वो औरत और बच्चे जिन्हें मीलों चलना पड़ता है
पानी के लिए, उनके गांव तक पानी पहुंचाना था।

हमें लड़ना था मिलकर
गरीबी से, भुखमरी से, अशिक्षा से,
अन्धविश्वाश से, पित्रसत्ता से, जातिवाद से
और ऐसी अनेक कुरीतियों से
हमे लड़ना था मिलकर
किसानों के, मज़दूरों के हक़ के लिए

और देखो, हम लड़ रहे हैं आपस में
धर्म के नाम पर, जाती के नाम पर
जिस युवा को इस सदी का नेतृत्व करना था
वो वर्तमान छोड़, उलझा हुआ है झूठे इतिहास में
वो खुद ही फँसा हुआ हैं नफरत के सैलाब में
वो फँसा हुआ झगड़े में हिंदू-मुसलमान के।

सोचो क्या यही चाहा था हमने
इक्कीसवीं सदी के भारत से।





कैसे कैसे लोग


कमाल की मिट्टी के बने होते हैं कुछ लोग
दौर ए मुश्किल में भी उगलते जहर ये लोग

धंधा ही बन गया है नफरत बोना और लड़वाना
कैसे आंख मिला पाते हैं अपने बच्चों से ये लोग

इस घड़ी में भी जो खेल रहें हिन्दू - मुस्लिम ये लोग
पूछो तो सही आखिर किस मिट्टी के बने हैं ये लोग

उसका माना, अरे उसका तो बरसों से उद्देश्य यही है
पर तुम, जो पढे लिखे हो, क्या मानते हो ये सही है

इतिहास उठा कर देखो भाई
कितनो ने जनता को कौमो में बांटा और लड़ाया
पर अंत देखो तुम सबका और सोचो क्या पाया

पढ़े लिखे को अपने यूँ ही जाया न करो
याद रखो इंसान हो, इंसानियत हो पहचान हमारी।

Sunday, February 16, 2020

सवाल पूछा करो

अगर आवाज़ उठाने को, सवाल पूछने को सही समझते हो
अगर महज़ एक मतदाता नहीं खुद को नागरिक समझते हो
तो आवाज़ उठाया करो और सवाल जरूर पूछा करो।

जरूरी नहीं कि तुम धरने पर बैठो
जरूरी नहीं कि तुम जुलूसों में जाओ
जरूरी नहीं कि तुम बड़ी बग़ावत करो

तुम बस अपने पढ़े लिखे को जाया न करो
हर बात को तर्क और विवेक से तोला करो
हर रोज़ छोटी-छोटी मिथ्याओं से लड़ा करो
ख़बरों से परे की ख़बरों की ख़बर रखा करो
जो दिखाया जा रहा है, आड़ में उसकी
क्या छुपाया जा रहा है  ये सोचा करो

जब सामान्य से परे सोचोगे
तो कई सवाल कौंधने लगेंगे
सवाल करोगे कि
कैसे अस्सी फीसद खतरे में है ?
और किससे  है खतरा इनको ?
भुखमरी में कौन से पायदान पे है हिन्दोस्तान ?
खुशहाल देशों की सूची मैं कहाँ है हम ?
क्यों महिलाएं भारत में सबसे असुरक्षित हैं ?
मंदिर - मस्जिद बन जाने से
क्या रोटी मिलेगी सबको ?
हिन्दू - मुस्लिम करने से
क्या पा जायेंगे हम?

जैसे भाप आईने में एक परत बना कर
आपका प्रतिबिम्ब धुंधला कर देता है
और साफ़ देखने  के लिए
आपको वो परत हटानी होती है
ऐसे ही सच्चाई जानने के लिए
कई परतें उधेड़नी पड़ती हैं
ये तो तय है जो दिखाया जा रहा है
सच उसके परे है, कुछ और
इसलिए सवाल करो
और सबसे पहले खुद से।

जब सामान्य से परे देखोगे
तब दिखेंगे वो सारे सवाल
जिनसे तुम्हारा सरोकार है
और जिन्हे तुमसे छुपाया जा रहा है
खोजो उन सवालों को और
मांगो  उनके जवाब
अगर सवाल पूछना और जवाब मांगना छोड़ दोगे
तो समझो इंसान होना छोड़ रहे हो











Thursday, January 9, 2020

जरा सोचो !

जिसको पूजते हो आज ईश्वर के मानी
जिसकी हर बात समझते हो ब्रह्म वाणी
जरा रुको और सोचो  -
उसको पूजते हुए और उसकी  हर बात मानते हुए
कहाँ तक आ गए हो और किन मूल्यों से बेगाने हुए


याद करो जब  किया था सफर का आगाज़
तब क्या बुलंद थे मंसूबे और क्या था अंदाज़
याद करो ,जरा याद करो -
" सबका साथ सबका विकास "
" बहुत हुई महंगाई की मार"
" बहुत हुआ नारी पर वार "
और जाने कितने ऐसे वादे जिनको पूरा होना था
 कितने वादे जिनसे जनता का असल सरोकार था

जाने कैसे सबकुछ भूलकर तुम अब भी  देते हो उसका साथ?
अब तो बच्चे भी समझ गए करना सिद्ध उसे बस अपना स्वार्थ
उसने झूठे दुश्मन गढ़ कर तुमको आपस में लड़ाया है
अरे, समझो उसने ही तो धर्म की आग को भड़काया है
हाल वो कर दिया देश का,सबको सड़कों पर लाया है
देश का किसान,मजदूर और छात्र सड़क पर आया है
और बात हुई एक शर्मनाक बहुत
कॉलेज में चली गोलियां और  गोले छूटे आँसू  गैस के
बोलो जरा क्या इसी दिन का वादा था ?


दिल पर रख कर हाथ ये कह दो क्या इसी दिन का वादा था?

Tuesday, January 7, 2020

नफ़रत का बीज

मैं जहालत और नफ़रत का बीज हूँ
मैं इस मुल्क के किये धरे पे पानी फेर दूंगा
मैं तुम्हारी बुद्धि और विवेक हर लूँगा
मैं इस मुल्क के किये धरे पे पानी फेर दूंगा।

मैं जो हूँ, पनपता हूँ वहां -
जहाँ भूख होती है और ग़ुरबत खूब होती है
जहाँ करुणा  मृत और ईर्ष्या  खूब  होती है
जहाँ तर्क की जगहंसाई और कुतर्क पर तालियां होती हैं
जहाँ धर्म, जात -पात, अमीर- गरीब की एक गहरी खाई होती है
ऐसा मुल्क मेरे पनपने के लिए उपजाऊ होता है
मुझे बस झूठ के सहारे लोगों को बाँटना और तोड़ना है।

फिर क्या ...........बस मेरा ही एकछत्र राज होगा
नया एक सविंधान और नया एक राष्ट्र होगा
सर झुकाये जो चलेंगे लीक पर वो खुशहाल रहेंगे
और जो पूछेंगे सवाल वो हमारी जेल भरेंगे।


पास में एक करुणा और प्रेम का बीज सब सुन रहा था
और सुनकर ये सब वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था
कितने तानाशाहों ने ठीक यही सोचा ...... कितनी बार
पर  इतिहास  खंगालकर देखो हुई हमेशा उनकी हार
थोड़ी देर भले ही हो जाये --
प्रेम हमेशा जीतता है , मानवता हमेशा जीतती है
जब लोग एक दूसरे के लिए खड़े होते हैं
तो बड़े बड़े तानाशाहों के तख़्त पलट जाते हैं
अभी तुम देख नहीं पा रहे हो , तुम्हारे अंत की शुरुआत हो चुकी है
विश्वविद्यालयों से  निकलकर  बग़ावत अब सड़क तक आ चुकी है।


जैसे वो तानाशाह हारे थे तुम भी हारोगे।


(पाश की एक कविता से प्रेरित )












Monday, November 25, 2019

सावधान रहो !

ये जो देश होता है न
ये सिर्फ कागज़ पर बना एक नक्शा नहीं होता
या फिर सिर्फ इमारतें, सड़कें, कारखाने नहीं होता
देश की पहचान सिर्फ वहां के पूंजीपतियों  से नहीं होती
और न ही वहां के पर्यटकस्थलों से होती है|

देश ..................
देश बनता हर उस इंसान से जो उसमे रहता है
फिर वो चाहे अमीर हो या ग़रीब
हिन्दू हो, मुसलमान हो या कोई और
पूरब से हो या पश्चिम से ,उत्तर से हो या दक्षिण से
सब से मिलकर सबके साथ मिलकर देश बनता  है|

हम कौन सी शक्ति बनना चाहते हैं ?
जब देश ही बंट रहा हो धर्म के नाम पर
जब विवेक ही मर रहा हो भक्ति के नाम पर
जब गिरेबां  पकड़ कर  राष्ट्रभक्ति सिखा रहे हों
जब इतिहास को ही बदल कर पढ़ा रहे हों |

एक घिनोना खेल रच रहा है कोई
अपना उल्लू सीधा कर रहा है कोई
सावधान रहो |
कोई चाहता है देश में एकता न हो बस एकरूपता हो 
कोई चाहता है जनता  भेड़  बन जाये
और वो जहां चाहे उन्हें वहां हाँक पाये
सावधान रहो |


--- मनोज


अजीब दौर

जी रहे हैं एक अजीब से दौर में हम
परेशां हैं हुक्मरां जो थोड़ा पढ़ गए हम
पढ़ते हो इतना क्यों ? पूछते हैं ये सवाल
अब दे इसका भला कोई क्या जवाब |

परेशां हैं हुक्मरां मुल्क के, पढ़ लिए अगर  तो
इल्म पा जाएंगे और इल्म जो हासिल हुआ तो
 फिर सवाल पूछे जाएंगे, और खूब पूछे जायेंगे
सवाल जो पूछे जाएंगे जो जवाब कहाँ से लाएंगे |


चाल उसने है चली कुछ वही और कुछ नई
चाल वही कि इक दरार डाल दो और इनको बाँट दो
दुश्मन इक फर्जी तैयार करो और हाथ में हथियार दो
चाल नई ये कि, क्यों न बुद्धि ही इनकी हर लो
मिलता जहाँ ज्ञान है वो ही अपने वश में कर लो
जो इन्हे सोचना सिखाये उस पर ही नकेल कस दो

इसलिए तो हो रहा है आज तमाशा दिल्ली में
छोड़ कर अपनी पढाई लड़ रहे  हैं सड़कों  पे
कहना उनका तालीम सब के लिए जरूरी है
हो मुहैया सबको इसमें क्या मज़बूरी है
यही तो वो सवाल हैं जिनके कुछ न जवाब हैं |

इसलिए तो हैं परेशां हुक्मरां मेरे मुल्क के
कि सवाल पूछे जायेंगे तो जवाब कहाँ से लाएंगे |


--मनोज

Saturday, October 19, 2019

बारिश


आये बादल ढक लिया सूरज
कड़की बिजली डर गए हम
फिर बूँदें बरसी छम - छम - छम
तो निकल पड़े भई घर से हम
खूब भीगे फिर बारिश में
और मचाया खूब उधम

-- मनोज 

घड़ी




घड़ी - घड़ी मैं देखूं घड़ी
कब से है अटकी यहीं पड़ी 
घूम जरा थोड़ा जोर लगा 
जल्दी से तू पांच बजा 
बजे पांच तो मैं बाहर जाऊं 
खेलूं - कूदूं धूम मचाऊं 
      

                 -- मनोज