जी रहे हैं एक अजीब से दौर में हम
परेशां हैं हुक्मरां जो थोड़ा पढ़ गए हम
पढ़ते हो इतना क्यों ? पूछते हैं ये सवाल
अब दे इसका भला कोई क्या जवाब |
परेशां हैं हुक्मरां मुल्क के, पढ़ लिए अगर तो
इल्म पा जाएंगे और इल्म जो हासिल हुआ तो
फिर सवाल पूछे जाएंगे, और खूब पूछे जायेंगे
सवाल जो पूछे जाएंगे जो जवाब कहाँ से लाएंगे |
चाल उसने है चली कुछ वही और कुछ नई
चाल वही कि इक दरार डाल दो और इनको बाँट दो
दुश्मन इक फर्जी तैयार करो और हाथ में हथियार दो
चाल नई ये कि, क्यों न बुद्धि ही इनकी हर लो
मिलता जहाँ ज्ञान है वो ही अपने वश में कर लो
जो इन्हे सोचना सिखाये उस पर ही नकेल कस दो
इसलिए तो हो रहा है आज तमाशा दिल्ली में
छोड़ कर अपनी पढाई लड़ रहे हैं सड़कों पे
कहना उनका तालीम सब के लिए जरूरी है
हो मुहैया सबको इसमें क्या मज़बूरी है
यही तो वो सवाल हैं जिनके कुछ न जवाब हैं |
इसलिए तो हैं परेशां हुक्मरां मेरे मुल्क के
कि सवाल पूछे जायेंगे तो जवाब कहाँ से लाएंगे |
--मनोज
परेशां हैं हुक्मरां जो थोड़ा पढ़ गए हम
पढ़ते हो इतना क्यों ? पूछते हैं ये सवाल
अब दे इसका भला कोई क्या जवाब |
परेशां हैं हुक्मरां मुल्क के, पढ़ लिए अगर तो
इल्म पा जाएंगे और इल्म जो हासिल हुआ तो
फिर सवाल पूछे जाएंगे, और खूब पूछे जायेंगे
सवाल जो पूछे जाएंगे जो जवाब कहाँ से लाएंगे |
चाल उसने है चली कुछ वही और कुछ नई
चाल वही कि इक दरार डाल दो और इनको बाँट दो
दुश्मन इक फर्जी तैयार करो और हाथ में हथियार दो
चाल नई ये कि, क्यों न बुद्धि ही इनकी हर लो
मिलता जहाँ ज्ञान है वो ही अपने वश में कर लो
जो इन्हे सोचना सिखाये उस पर ही नकेल कस दो
इसलिए तो हो रहा है आज तमाशा दिल्ली में
छोड़ कर अपनी पढाई लड़ रहे हैं सड़कों पे
कहना उनका तालीम सब के लिए जरूरी है
हो मुहैया सबको इसमें क्या मज़बूरी है
यही तो वो सवाल हैं जिनके कुछ न जवाब हैं |
इसलिए तो हैं परेशां हुक्मरां मेरे मुल्क के
कि सवाल पूछे जायेंगे तो जवाब कहाँ से लाएंगे |
--मनोज
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