कमाल की मिट्टी के बने होते हैं कुछ लोग
दौर ए मुश्किल में भी उगलते जहर ये लोग
धंधा ही बन गया है नफरत बोना और लड़वाना
कैसे आंख मिला पाते हैं अपने बच्चों से ये लोग
इस घड़ी में भी जो खेल रहें हिन्दू - मुस्लिम ये लोग
पूछो तो सही आखिर किस मिट्टी के बने हैं ये लोग
उसका माना, अरे उसका तो बरसों से उद्देश्य यही है
पर तुम, जो पढे लिखे हो, क्या मानते हो ये सही है
इतिहास उठा कर देखो भाई
कितनो ने जनता को कौमो में बांटा और लड़ाया
पर अंत देखो तुम सबका और सोचो क्या पाया
पढ़े लिखे को अपने यूँ ही जाया न करो
याद रखो इंसान हो, इंसानियत हो पहचान हमारी।
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