Monday, November 25, 2019

सावधान रहो !

ये जो देश होता है न
ये सिर्फ कागज़ पर बना एक नक्शा नहीं होता
या फिर सिर्फ इमारतें, सड़कें, कारखाने नहीं होता
देश की पहचान सिर्फ वहां के पूंजीपतियों  से नहीं होती
और न ही वहां के पर्यटकस्थलों से होती है|

देश ..................
देश बनता हर उस इंसान से जो उसमे रहता है
फिर वो चाहे अमीर हो या ग़रीब
हिन्दू हो, मुसलमान हो या कोई और
पूरब से हो या पश्चिम से ,उत्तर से हो या दक्षिण से
सब से मिलकर सबके साथ मिलकर देश बनता  है|

हम कौन सी शक्ति बनना चाहते हैं ?
जब देश ही बंट रहा हो धर्म के नाम पर
जब विवेक ही मर रहा हो भक्ति के नाम पर
जब गिरेबां  पकड़ कर  राष्ट्रभक्ति सिखा रहे हों
जब इतिहास को ही बदल कर पढ़ा रहे हों |

एक घिनोना खेल रच रहा है कोई
अपना उल्लू सीधा कर रहा है कोई
सावधान रहो |
कोई चाहता है देश में एकता न हो बस एकरूपता हो 
कोई चाहता है जनता  भेड़  बन जाये
और वो जहां चाहे उन्हें वहां हाँक पाये
सावधान रहो |


--- मनोज


अजीब दौर

जी रहे हैं एक अजीब से दौर में हम
परेशां हैं हुक्मरां जो थोड़ा पढ़ गए हम
पढ़ते हो इतना क्यों ? पूछते हैं ये सवाल
अब दे इसका भला कोई क्या जवाब |

परेशां हैं हुक्मरां मुल्क के, पढ़ लिए अगर  तो
इल्म पा जाएंगे और इल्म जो हासिल हुआ तो
 फिर सवाल पूछे जाएंगे, और खूब पूछे जायेंगे
सवाल जो पूछे जाएंगे जो जवाब कहाँ से लाएंगे |


चाल उसने है चली कुछ वही और कुछ नई
चाल वही कि इक दरार डाल दो और इनको बाँट दो
दुश्मन इक फर्जी तैयार करो और हाथ में हथियार दो
चाल नई ये कि, क्यों न बुद्धि ही इनकी हर लो
मिलता जहाँ ज्ञान है वो ही अपने वश में कर लो
जो इन्हे सोचना सिखाये उस पर ही नकेल कस दो

इसलिए तो हो रहा है आज तमाशा दिल्ली में
छोड़ कर अपनी पढाई लड़ रहे  हैं सड़कों  पे
कहना उनका तालीम सब के लिए जरूरी है
हो मुहैया सबको इसमें क्या मज़बूरी है
यही तो वो सवाल हैं जिनके कुछ न जवाब हैं |

इसलिए तो हैं परेशां हुक्मरां मेरे मुल्क के
कि सवाल पूछे जायेंगे तो जवाब कहाँ से लाएंगे |


--मनोज